द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है- जैसे ‘यह सब पानी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अन्य अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।

द्विवेदी जी ने अपनी रचनाओं में स्त्री शक्ति की महिमा को बारम्बार दोहराया है। इसी उपक्रम में वे व्यंग्य शैली का सहारा लेकर स्त्री शिक्षा के विरोध में आये कुतर्कों का बखूबी खंडन करते हैं और कहते हैं-

(क) स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट। कहने का अर्थ है लेखक के समकालीन भारत में स्त्रियों को घर में ही रहने की सलाह दी जाती थी। उन्हें परदा प्रथा का पालन करना पड़ता था। बचपन में उन्हें पिता के अधीनस्थ रहना पड़ता था युवावस्था में उन्हें पति के सहारे रहना पड़ता था और वृद्धावस्था में उन्हें पुत्र की आज्ञा का पालन करना पड़ता था। यह पुरुषवादी सोच सदियों से भारतीय समाज में स्त्रियों के उपर लागू थी। फिर ऐसे माहौल में स्त्री शिक्षा के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात थी। सही अर्थों में इस माहौल में समाज में स्त्रियों का पढना कालकूट या विष के समान और पुरूषों का पढना अमृत के समान समझा जाता था।


(ख) अच्छा तो उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियाँ कौन-सी भाषा बोलती थीं? उनकी संस्कृत क्या कोई गँवारी संस्कृत थी? यहां उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियों का अर्थ वाल्मीकि और अन्य ऋषियों की पत्नियों से है। हमें ज्ञात है कि राम द्वारा सीता के परित्याग करने के उपरांत सीताजी को ऋषि वाल्मिकी के आश्रम में रहना पड़ा था। यह प्रसंग हम उत्तर रामायण में पाते हैं जहां ऋषि पत्नियों को संस्कृत भाषा में बोलना बताया गया है। इसलिए यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में स्त्रियां काफी संख्या में संस्कृत भाषा बोलती थीं।


(ग) जिन पंडितों ने गाथा-सप्तशती, सेतुबंध महाकाव्य और कुमारपालित आदि ग्रंथ प्राकृत में बनाए हैं वे यदि अपढ़ और गँवार थे तो हिंदी के प्रसिद्ध-से-प्रसिद्ध अखबार के संपादकों को भी इस जमाने में अपढ़ और गँवार कहा जा सकता है_ क्योंकि वह अपने जमाने की प्रचलित भाषा में अखबार लिखता है।


यहां पर लेखक हमें समझाते हैं कि प्राचीन भारत में प्राकृत भाषा में लिखे गये ग्रंथ के रचियता किसी मामले में अनपढ़ या गंवार नहीं थे। वे सभी विद्वान लेखक अपने समय की प्रचलित भाषा प्राकृत में लिखते थे। ऐसा इसिलिए था क्योंकि प्राकृत भाषा अधिक से अधिक लोगों में ग्राह्य थी। आज भी लेखक अपनी रचना इस जमाने की प्रचलित भाषा में लिखते हैं। इसिलिए प्राकृत भाषा में लिखने वालों को अनपढ या गंवार मानना बिल्कुल गलत है।


(घ) अत्रि की पत्नी, पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटों पांडित्य प्रकट करें, गार्गी ब्रह्मवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गजब!’’


लेखक यहां अत्रि की पत्नी, गार्गी और मंडन मिश्र की पत्नी की वाक्पटुता या कहें बोलने की शैली के कायल हैं। वे इन स्त्रियों की विद्वता पर अपना खुशी मिश्रित आश्चर्य प्रकट करते हैं और मुक्त कंठ से इन स्त्रियों के सम्मान में उनकी प्रशंसा में दो शब्द कह डालते हैं। क्योंकि इन स्त्रियों की विद्वता के आगे बड़े-बड़े पुरूष विद्वान परास्त हो गये थे।


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